लघुकथा|शब्द मसीहा

shabd masiha

महक
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“अरे! यार तुम मेरे कमरे में आने से कतराते क्यों हो ? आखिर हमने एक साथ ही तो ज्वाइन किया था फिर तुम खुद को छोटा क्यों समझते हो !”

” सर! अभी मैं क्लास थ्री कर्मचारी हूँ, अफसर के साथ रहने लगा तो मेरे साथी मुझे भी अलग ही समझने लगेंगे और मुझे तो अभी पंद्रह साल इनके हीसाथ काम करना है!”

” छोडो यार! ये क्लास का चक्कर…ये बताओ तुम्हारे कमरे से महक कैसी आती रहती है?”

” सर! मैं रोज अपनी सीट पर पूजा के बाद काम शुरू करता हूँ और अगरबत्ती लगता हूँ भगवान् के सामने.”

“ओह! ये बात है….तो यार एक पैकेट मुझे भी ला कर देना… बहुत मोहक खुशबू है.”

वह सोच रहा था अगरबत्ती से कमरा तो महक जाएगा पर मन और मस्तिष्क को कौन महकाएगा?

शब्द मसीहा

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