POEM|CHANDRA VIJAY PRASAD CHANDAN

करमजली, जार-जार क्यों रोती तू बुक्का फाड़
हलक निवाले ना मिलेंगे ना तू पा सकोगी लाड़

विरह-वेदना की गीत बनी,है तेरे जीवन का सार
उष्ण उर्वर कोख से जनी तू कुक्कुरमुत्ते की झाड़

श्वान गोद लिए बैठ दुलराती,स्नेह लुटाती अपार
दुर्र -दुर्र महकता बदन है तेरा सो तू पाती लताड़

झरने बन आंसू जो बहता होकर जब तू लाचार
किन्तु अर्थहीन जीवन तेरा ज्यों तू पेड़ है ताड़

कुलबुलाती अंतड़ियों के वेदना पर है थिरकती
काँपती ठीठुराती सर्द रात में बदन दिया उघाड़

—-@चंद्र विजय प्रसाद “चन्दन”देवघर,झारखण्ड

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