SHAYARI|KAVITA SINGH

बड़े हसीन ख़्वाब दीदे तर में थे छुपे कभी –
हयात ही गुज़र गई मसाफ़तों में किस लिए !
‘वफ़ा’ के साथ-साथ ही सबा भी गुनगुनाई थी –
फ़िज़ा ही बे-मेहर हुई है सा’अतों में किस लिए !
कविता सिंह ‘वफ़ा’
Masaafat_safar,journey ,,saa’at -vaqt samay

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